महावीर जयंती पर डॉ. सम्राट् सुधा का संदेश: स्याद्वाद सिद्धांत आज भी मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक

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रुड़की (आयुष गुप्ता)

स्याद्वाद जैन दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त अथवा ‘नय’ है। इसके अनुसार ‘नय’ किसी भी वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि का वस्तुनिष्ठ परामर्श है। स्याद् या स्यात् शब्द का अर्थ ‘संशय’ है, परन्तु जैनदर्शन का स्याद्वाद मात्र संशय की परिधि तक ही सिमटा हुआ नहीं है। यहाँ संशय किसी के अस्तित्व के सन्दर्भ में न होकर, उसके एकान्तिक वर्णन के सन्दर्भ में है। यह दर्शन या सिद्धांत आज भी सभी के लिए उपादेय है। ये विचार साहित्यकार एवं प्रोफेसर डाॅ. सम्राट् सुधा ने महावीर जयंती के उपलक्ष्य में व्यक्त किये।
डाॅ. सम्राट् सुधा ने कहा कि उक्त दर्शन का उल्लेख यद्यपि महावीर स्वामी से पूर्व भी अनेक जैन संतों की वाणी में है, तथापि महावीर स्वामी ने इसे विस्तार से कहा। लगभग 320000 वर्ष पूर्व महावीर स्वामी ने ‘स्याद्वाद्’ के सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘एक ही वस्तु में देश, काल तथा अवस्था-भेद से अनेक विरुद्ध या अविरुद्ध धर्मों का होना सम्भव है। अतः एकान्त-रीति से अमुक वस्तु का अमुक धर्म है, दूसरा नहीं-यह कहना ठीक नहीं।’ डाॅ. सम्राट् सुधा ने कहा कि यह सत्य है कि एक समय में एक व्यक्ति किसी सिक्के का एक ही पहलू देख सकता है। यही एक पहलू क्या उस सिक्के की सम्पूर्णता है? यहां सिक्के के अस्तित्व को लेकर मतान्तरण नहीं है, वरन् उसके एक पक्ष को देखकर किए जाने वाले वर्णन पर प्रश्नचिह्न है। मात्र एक पक्ष को देखकर किसी का वर्णन करना आंशिक सत्य होगा। स्याद्वाद का अन्तर्निहित अर्थ यही है कि कोई भी निर्णय पूर्ण सत्य नहीं होता है और प्रत्येक निर्णय में अन्ततः स्याद् अर्थात् कदाचित की गुंजाइश अवश्य रहती है। किसी मूर्ति की कल्पना कीजिए। मूर्ति स्वयं में क्या है-एक कलात्मक रुपान्तरण, मात्र मिट्टी या एक मूर्तिकार की कल्पना का साकार रुप? जिस प्रकार उक्त कलात्मक रूपान्तरण एक सत्य न होकर आंशिक सत्य है, उसी प्रकार मिट्टी स्वयं में एक न होकर अनेक पदार्थों का सम्मिश्रण है। मूर्तिकार की कल्पना मूर्ति के निर्माण की प्रक्रिया में लक्ष्य बोध का कार्य करती है, परन्तु अन्ततः जो मूर्ति बनती है, वह मूर्तिकार की कल्पना का वास्तविक रुप न होकर, उसकी आंशिक प्रस्तुति ही होती है। जब हम मूर्ति को देखते हैं, तो कलात्मक रुपान्तरण, मिट्टी और मूर्तिकार तीनों हमारे विचारों में कहीं नहीं होते हैं। हमारी दृष्टि मात्र मूर्ति पर होती है, जो एक आंशिक सत्य है। किसी अन्य घटना, वस्तु व व्यक्ति ही क्यों, हम स्वयं के संदर्भ में भी स्याद्वाद् के परिप्रेक्ष्य में विचार कर सकते हैं। कोई यदि हमसे हमारा जीवन-परिचय पूछे, तो परिचय देते हुए हम कितने सत्यवादी होते हैं? सामान्य वार्तालाप में भी प्रायः हमारी बात दूसरे को प्रभावित करने वाली और देशकाल की परिस्थितियों से प्रभावित होती है। आत्मचिन्तन करते हुए भी हम अपनी त्रुटियों व्यं से मुंह फेरकर प्रायः अपनी ऐसी छवि गढ़ते हैं, जिस पर आत्म-मुग्ध हुआ जा सके। स्पष्टतः मनुष्य मनचाहा एकान्तिक सत्य ही देखना व जानना चाहता है, जो सदैव उसे सत्य-पथ से दूर रखता है। डाॅ. सम्राट् सुधा ने कहा कि महावीर स्वामी द्वारा समुचित रूप से व्याख्यायित  ‘स्याद्वाद’ स्पष्टतः एक व्यवहारिक एवं वर्तमान में भी उपादेय सिद्धान्त है। किसी धर्म या दर्शन विशेष के अनुयायियों के लिए ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण मानव-जगत् हेतु यह कल्याणकारी है। स्याद्वाद् निस्सन्देह ज्ञान और दर्शन की हमारी विराट बौद्धिक सम्पदा का शाश्वत रत्न है।

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