हिंदी पत्रकारिता के 200 साल: फेक न्यूज और एआई के दौर में विश्वसनीयता सबसे बड़ी चुनौती—राज्यपाल

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रुड़की (आयुष गुप्ता)

हिंदी पत्रकारिता के द्विशताब्दी वर्ष में हमें विचार करना होगा कि दो सौ साल पहले हमारे पूर्वजों ने किस तरह स्वतंत्रता आंदोलन में आम लोगों में चेतना जगाई। आज फेक न्यूज का दौर है। ऐसे में पत्रकारिता के सामने अनेक चुनौतियां हैं। यह चिंता राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने सप्रे संग्रहालय के कार्यक्रम में जताई। संग्रहालय ने महान संपादक और क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्यतिथि पर यह कार्यक्रम किया था। इस अवसर पर राज्यपाल ने लोकमत के संपादक विकास मिश्र को माधवराव सप्रे सम्मान से अलंकृत किया। उन्होंने दैनिक ट्रिब्यून के सहायक संपादक अरुण नैथानी को ‘महेश गुप्ता सम्मान’ और बृजेश शर्मा को अशोक मानोरिया ‘आंचलिक पत्रकारिता सम्मान’ से अलंकृत किया। ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय के बारे में उन्होंने कहा कि पांच वर्षों में पांच बार यहां आया हूं। हर बार यहां संतोष मिलता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में बरकत उल्ला विवि के कुलगुरु डाॅ. एसके जैन ने कहा कि पहले पत्रकारों की कलम समाज को नई दिशा देती थी। लेकिन आज चैट जीपीटी और एआई के जमाने में वैचारिक लेखन प्रभावित हुआ है। मुख्य वक्तव्य देते हुए माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि हिंदी के पहले समाचार पत्र उदन्त मार्तंड का मूल मंत्र हिंदुस्तान का हित था। लेकिन दो सदियों के बाद पत्रकारिता में हम इससे भटक गए हैं। श्री तिवारी ने सरकारी संस्थानों में बढ़ती छुट्टियों और घटते कार्य दिवसों पर चिंता जताई। इस वजह से चलते संस्थानों के कार्य और कर्मचारियों की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। आरंभ में सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर ने बताया कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने पर सप्रे संग्रहालय की पहल पर देश में अनेक आयोजन किए जा रहे हैं। यह भी इसी कड़ी का हिस्सा है। विद्यार्थी जी से उन युवाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए, जो पत्रकारिता में आना चाहते हैं। कार्यक्रम के दूसरे चरण में हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के सफर पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और बायोपिक फिल्म निर्देशक राजेश बादल ने की। गोष्ठी में विकास मिश्रा और अरुण नैथानी ने भी विचार रखे। विकास मिश्र ने कहा कि पुराने पत्रकारों की भाषा शुद्ध और समृद्ध होती थी। आज भाषा में शुद्धता नहीं है। यह अशुद्धता भी गंभीर चुनौती है, जैसी विश्वसनीयता की है। उन्होंने कहा कि नए पत्रकार इस क्षेत्र में चकाचैंध के कारण आ रहे हैं। इससे स्वस्थ पत्रकारिता हाशिये पर चली गई है। वरिष्ठ पत्रकार अरुण नैथानी ने कहा कि समाज चिकित्सा और पत्रकारिता दोनों ही क्षेत्रों में विश्वसनीयता की आशा करता है, किंतु आज ऐसा नहीं है। सोशल मीडिया ने सारा वातावरण दूषित कर दिया है। इसके दुष्परिणाम आने वाले समय में भुगतने होंगे। उन्होंने विजयदत्त श्रीधर के ग्रन्थ समग्र भारतीय पत्रकारिता को तीन खंडों के शोध ग्रंथ के स्थान पर संक्षिप्त स्वरूप में एक साथ प्रकाशित करने का सुझाव दिया। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के सबसे बड़े पत्रकार थे। उन्होंने पत्रकारिता के इतिहास के ऐसे कई अनछुए पहलुओं का उल्लेख किया और कहा कि इन सभी को पत्रकारिता पाठ्यक्रमों में शामिल करना चाहिए, जिससे नई पीढ़ी के पत्रकार इतिहास को सही रुप से समझ सकें। उन्होंने पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों से आग्रह किया कि वे पत्रकारिता के पुरोधाओं की जिंदगी से जुड़ी हर कथा को पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाएं। दोनों सत्रों का संचालन सप्रे संग्रहालय के निदेशक अरविन्द श्रीधर ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक, पत्रकार, लेखक और अधिकारी मौजूद रहे।

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